नक्कारखाना

.. तूती भी बोलती है ।

शाम की ऊहापोह

without comments

एक उदास शाम कल फिर मेरी तनहाइयों को
और तनहा कर गई;
मेरी गुमनामियों में, खामोशियों में
कुछ और टेल जड़ गई.
मैं अपनी उलझनों में डूबा हुआ,
उन्हें सुलझाने की कोशिश कर रहा था,
आई जो शाम,
मेरे समाधानों को अपनी आँधियों में समेटे
इक नई उलझन पैदा कर गई,
मेरी ख्वाहिशों में इक और ख्वाहिश की शुमारी कर गई.
ख्वाहिश एक अदद ख़ुशी की,
उस तरस में और खुश्की भर गई.

इतनी परेशानियों के बावजूद, वो शाम मेरे दिल से
एक प्यारी सी गुफ्तगू कर गई,
लगती तो दुश्मन थी पर जाने क्यूँ
मुझसे दोस्ती कर गई.
अचना आई थी, रुलाते हुए, गई भी अचानक और
एक बार फिर रुला कर गई,
एक अलग तरह से रुला कर गई.

आज फिर इक शाम आई है
कल वाली की यादों के साथ.
मैं दोनों को तुलना चाहता हूँ,
जानना चाहता हूँ -
बेहतर किसका तराना है?
वो जो आज हकीकत है या
वो जो आज फ़साना है.


‘अजीब’ सुधांशु
29 Dec, 2002

Written by Sudhanshu

December 15, 2007 at 5:06 pm

Leave a Reply