नक्कारखाना

.. तूती भी बोलती है ।

स्वप्न्शून्य यथार्थ

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भविष्य की अनिश्चितताओं से बेखबर
हम सभी,
सुखद भविष्य की कामना को
अपने मन में संजोये, आज
एक नया रूप देने का प्रयास कर रहे हैं.

सभी के सपने, कोमल मृदुल सपने
अंतःकरण को प्रज्वलित कर रहे हैं.
सभी बेखबर हैं आने वाले पल से
पर सभी के मन असीम आकाश में विचरण कर रहे हैं.

सभी के अन्तः में भावों का विशाल समुद्र उमड़ रहा है
साथ में है ढूमिलता के ज्वार-भाटे -
हव सभी क अस्पष्ट,
भाव भी हैं अधखुले पट -
कभी चौखट पर दुनिया को बुलाने का मन करता है
तो कभी जबरन ही द्वार बंद करने का करते हम जतन.
हमें खुद नहीं पता की हम क्या करना चाहते हैं
पर फिर उम्मीदों का इक आशियाँ बनाते हैं.

अपने मन की कल्पनाओं को
यथार्थता की पृष्ठभूमि दे हम
भले ही अपने आप को छल रहे हों
पर हाँ,
हमें विश्वास है की
आज के ये स्वप्न
निश्चित ही कल आने वाली
नई सुबह के साथ
नई किरण बन कर आयेंगे, और हमें
अपनी यथार्थता का बोध कर कर जायेंगे.
हाँ अवश्य,
कल हम सभी स्वस्थ हवा में साँस लेंगे,
एक नई पगडण्डी पर पैर रखेंगे, जो
हमारे स्पर्श से पक्की सड़क में परिवर्तित हो
हमारा मार्ग सुखद और हमारा जीवन समृद्ध बनाएगी.

दुनिया उम्मीदों के पुल पर कायम है
पर उन पुलों को हम देंगे सत्य का स्वरूप
उनकी नींव तैयार कर उन्हें बाँधेंगे हम
मिटा देंगे अनिश्चितताओं को.
सभी के लिए होगा इक सुनहरा भविष्य
सभी को मिलेगा इक नया आसमान,
इक नया सूर्य, एक नया क्षितिज.


‘अजीब’ सुधांशु
23 Apr, 2003

Written by Sudhanshu

December 15, 2007 at 5:20 pm

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