नक्कारखाना

.. तूती भी बोलती है ।

जिंदगी बंदगी और गंदगी

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ये मेरी जिंदगी, कैसी थी बंदगी.
मौत में भी ख़ुशी ढूँढती जिंदगी.
हार का जश्न था, गम पे रोती हंसी.
अपनी तनहाइयों में थी धूमें बसीं.

हर उदासी पे दिल देखो कहता यही
हैं कई जिनने ज्यादा निराशा सही.
मन तसल्ली था देता पर, ‘मगर’ था कहीं.
रंज है किसी से, किसीने की दिल्लगी.

अश्क हो बांटते, ओ मेरे हमसफ़र
तुम ही साथी मेरे, तुम मेरे रहगुजर.
जब भी डूबा ये दिल, तुमसे दिल की कही
तुमने समझा हर गम, मन में आसें भरीं.

पर मेरे भाग्य का था यही फैसला -
हर ख़ुशी की मौत में, गम रुदाली बने
जो भी थोड़ा सुख मिले, तड़पाता निकल ले.
स्वच्छ निर्मल लगे याम की गंदगी.
ये मेरी जिंदगी, बन गई बंदगी.

तुझसे है जुस्तजू, ऐ मेरी दिलरुबा
अब हँसाना छोड़ दे, मुझको रोना सिखा
आंख में भरे आंसू, उनको यूँ न सुखा
मौत तक तो हंसाया, कब्र में तो रुला.

बन के जोकर बिता दी वो सारी जिंदगी
जिसमे थी बाढ़ खुशियों भरी मौत की.


‘अजीब’ सुधांशु
26 Nov, 2003

Written by Sudhanshu

December 15, 2007 at 6:25 pm

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