हम सब नौटंकी करते हैं
हम सब नौटंकी करते हैंबहुत ही पहले से हम सबने सुना है , समझा , जाना है ।
जीवन सारा इक नाटक है , हम सबने इसको माना है ।।
सभी यहाँ जीवन-नाटक के पात्र निभाया करते हैं ,
लेकिन देखो हम कैसे हर नाटक में जीवन भरते हैं ,
नाटक से जीवन में कैसे हम हलचल लाया करते हैं ।
हम सब नौटंकी करते हैं ।।
विश्वास आस में भर-भर के ,
उल्लास से प्यास बुझाकर के ,
पिरहास-हास से मिल-जुलकर ,
अनवरत प्रयास लगाकर के ,
उच्छ्वास समाज का हरते हैं ।
कभी चीख-चीख कर राहों में ,
या फिर परदों की छाँवों में ,
हम आँखें डाल निगाहों में ,
हर दिल पे दस्तक देते हैं ।
हम यूँ नौटंकी करते हैं ।।
जब रात LHC के नीचे अपनी आवाज खनकती है ,
हम सबके जोश की गर्मी से सर्दी भी पिघला करती है ,
चंदा-तारे चेहरे के भावों से कुंठित हो जाते हैं ,
तो भोर में हम कोशिश करके अपनी script बनाते हैं ।
तालियों के शोर जब हर ओर गूँजा करते हैं ,
सारी थकान को छोड , भाव-विभोर होकर ,
इक नए उत्साह में सराबोर होकर ,
हम फिर से नौटंकी करते हैं ।।
तलवार कलम की धार नहीं ,
केवल आवाज की धार सही ,
ललकारो तो हुँकार सही ,
मुस्काओ तो है प्यार सही ।
पर अदा वही जो श्रोता के
दिल पर कर जाए वार सही ।
जब आन पड़े तो हम देखो कविता से आहट करते हैं ,
हम तो नौटंकी करते हैं ।।
–
‘अजीब’ सुधांशु
10 Apr, 2005
I have spent the last 5 minutes reading your creations.
Have you ever thought of publishing a book on poetry.
Your writing is of high grade!
Best Wishes!
Amitabh
January 6, 2009 at 11:15 am
Thanks Amitabh for finding my writing good enough to be appreciated.
Also, nice suggestion. I believe I have kept it as a future option when I will be facing the recession directly
Sudhanshu
January 6, 2009 at 5:50 pm