नक्कारखाना

.. तूती भी बोलती है ।

हंसी की चुम्मी…. पुच्ची !

with one comment

अपने होठों से हंसी को एक बार मिलने दे
जिंदगानी के ग़मों में खुशियाँ घुलने दे
जिंदगी मौत का पैगाम सही जाम सही
धीरे-धीरे निकल जाएगी वो शाम सही
तू उसी शाम में इक दौरे मजा चलने दे

अपने होठों से हंसी को एक बार मिलने दे
जिंदगानी के ग़मों में खुशियाँ घुलने दे

तू जो खुद को कभ कुम्हलाया सा पत्ता समझे
धुल की मोती परत में बस उदासी झलके
ओस की बूंदों से तू धुल जरा धुलने दे
अपने होठों से हंसी को एक बार मिलने दे
जिंदगानी के ग़मों में खुशियाँ घुलने दे


‘अजीब’ सुधांशु
09 Jun, 2006

Written by Sudhanshu

December 15, 2007 at 1:31 pm

One Response

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  1. short and sweet poetry.thank you very much

    Prakash Nema

    May 24, 2009 at 4:54 pm


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