हंसी की चुम्मी…. पुच्ची !
अपने होठों से हंसी को एक बार मिलने दे
जिंदगानी के ग़मों में खुशियाँ घुलने दे
जिंदगी मौत का पैगाम सही जाम सही
धीरे-धीरे निकल जाएगी वो शाम सही
तू उसी शाम में इक दौरे मजा चलने दे
अपने होठों से हंसी को एक बार मिलने दे
जिंदगानी के ग़मों में खुशियाँ घुलने दे
तू जो खुद को कभ कुम्हलाया सा पत्ता समझे
धुल की मोती परत में बस उदासी झलके
ओस की बूंदों से तू धुल जरा धुलने दे
अपने होठों से हंसी को एक बार मिलने दे
जिंदगानी के ग़मों में खुशियाँ घुलने दे
–
‘अजीब’ सुधांशु
09 Jun, 2006
short and sweet poetry.thank you very much
Prakash Nema
May 24, 2009 at 4:54 pm