Archive for the ‘तुकबंदी’ Category
फूल
अजी शिखर पर जो चढ़ना है तो कुछ संकट झेलो
चुभने दो-चार कांटें, फिर जी भर गुलाब से खेलो.
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जिसने मरना सीख लिया है जीने का अधिकार उसी को
जो काँटों के पथ पर आया फूलों का उपहार उसी को.
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वक्त को जिसने ना समझा उसे मिटना पड़ा है
बच गया तलवार से तो फूल से कटना पड़ा है.
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हिंद की विशेषता
एक राह के हैं मीत, मीत एक प्यार के
एक बाग के हैं फूल, फूल एक हार के
देखती है यह जमीन, आसमान देखता
अनेकता में एकता, ये हिंद की विशेषता.
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जीवन की परिभाषा
फूलों पर आँसू के मोती, और अश्रु में आशा
मिटटी के जीवन की छोटी नपी-तुली परिभाषा.
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रहता हूँ
लम्हा लम्हा मैं डर के रहता हूँ
जैसे शीशे के घर में रहता हूँ.
अक्स बस अक्स बन गया हूँ मैं
आइनों के नगर में रहता हूँ.
जब से मुझपे पड़ी नजर तेरी
तब से सबकी नजर में रहता हूँ.
अब्र बनकर के मैं बरसता हूँ
मौज बनकर भंवर में रहता हूँ
साज बनकर बिखर के रहता हूँ.
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मातृभाषा
है भव्य भारत ही हमारी मातृभाषा हरी-भरी
हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी
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मैथिलीशरण गुप्त
निज भाषा उन्नति अहई, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटत न हिय को शूल
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भारतेंदु हरिश्चंद्र
ज़िन्दगी
धुल है पुष्पगंधी बिखर जाएगी
वायु का क्या पता कब किधर जाएगी
अपनी काया का कुछ मूल्य समझा करो
जिंदगी फिर न वापस इधर आएगी
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आसमां थी और ज़मीं थी ज़िन्दगी
मैंने कल देखा यहीं थी ज़िन्दगी
उलझनों के नाम गिरवी हो गयी
दोस्तों काफी हसीं थी ज़िन्दगी
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प्यास मेरी जो बुझ गई होती
ज़िन्दगी फिर न ज़िन्दगी होती
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जिंदगी अब उधर लगती है
जिस्म पे रूह भर लगती है
जख्म एक बार हो तो सह भी लूं
चोट क्यों बार-बार लगती है
हर तरफ खुश्क हवा के झोंके
ख्वाब जैसे बहार लगती है
ओढ़नी तुझको सजा लूं कैसे
अब तो तू तार-तार लगती है
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किस्मत
जिंदगी शाम-ओ-सहर का झगडा
कोई आता है कोई जाता है
आने वाले उसी को गाते हैं
जो निशां अपने छोड़ जाता है
आह! ठोकर तुझे सलाम मेरा
मुझे गिरने से बचा जाता है
खोते-खोते कटी है राह-ए-गुजार
जिसकी किस्मत है वही पाता है
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प्रेम कि सृष्टि
मुझे वेद पुराण कुरान से क्या
मुझे सत्य का पाठ पढा दे कोई
मुझे मंदिर मस्जिद जाना नहीं
मुझे प्रेम का रंग चढा दे कोई
जहाँ उंच या नीच का भेद नहीं
जहाँ जात या पात कि बात नहीं
न हो मंदिर मस्जिद चर्च जहाँ
न हो पूजा नमाज में फर्क कहीं
जहाँ सत्य ही सार हो जीवन का
रिधवार सिंगार हो त्याग जहाँ
जहाँ प्रेम ही प्रेम कि सृष्टि मिले
चलो नाव को ले चलें खेके वहां.
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गोरखपुर
अवध की शाम बनारस की सुबह सदके हो
कि इक जहाँ से जुदा है अदा-ए गोरखपुर
पुकारती हैं सदा दिल फरेबियाँ इसकी
कि जिसे आ के हो जाना, न आए गोरखपुर.
एक मुक्तक
जो चाह वसंत की भृंगर में ,
जो प्रेम समर्पित है प्रिय को
वो सतत रहे हिय कण-कण में .