Archive for the ‘शेर-o-शायरी’ Category
उसने कहा था
न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ
न तो मैं किसी का हबीब हूँ न तो मैं किसी का रक़ीब हूँ
जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ जो उजड़ गया वो दयार हूँ
मेरा रन्ग-रूप बिगड़ गया मेरा यार मुझ से बिछड़ गया
जो चमन फ़िज़ाँ में उजड़ गया मैं उसी की फ़स्ल-ए-बहार हूँ
पये फ़ातेहा कोई आये क्यूँ कोई चार फूल चड़ाये क्यूँ
कोई आके शम्मा जलाये क्यूँ मैं वो बेकसी का मज़ार हूँ
मैं नहीं हूँ नग़मा-ए-जाँफ़िशाँ मुझे सुन के कोई करेगा क्या
मैं बड़े बरोग की हूँ सदा मैन बड़े दुख की पुकार हूँ
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बहादुर शाह जफ़र
(the moghul emperor)
उठिए जहान से
रहिए जहाँ में जब तलक इन्साँ के शान से
वरना कफ़न उठाइए, उठिए जहान से.
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दो बार नहीं मरना है
अब जो सिर पर आ पड़े नहीं डरना है
जन्मे हैं दो बार नहीं मरना है
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एहसास – ज़िन्दगी
एहसास कोई मर गया तो ज़िन्दगी कहाँ
जिंदा नहीं ज़मीर तो जिन्दादिली कहाँ
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पलकें भी चमक
पलकें भी चमक उठती है सोते में हमारी
आँखों को अभी ख्वाब छिपाने नहीं आते.
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बचपन के ज़माने
उड़ने दो परिंदों को अभी तुम शोख हवाओं में
कि लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते
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तूफान मिले
वो और होंगे जिन्हें आराम के सामान मिलें
अपनी कश्ती को तो सहिलों पे भी तूफान मिले
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मुफलिस
मुफलिस समझ यूँ न मुझे ठोकर से मारिए
मैं भी किसी गरीब के घर का चिराग हूँ
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नमाज
चलो रुक कर नमाज पढ़ लेंगे
देख लें भूख से रोता है कोई
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अपने चाहे
अपने चाहे कुछ कभी होता नहीं
जो करे वह सामने होता नहीं
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