thesis dedication

The last few days, I have been painstakingly trying to complete my thesis, so as to get going from this god awful garmi of Kanpur. But as the day passes by, I am amazed to find how I wasted it.

लो दिन बीता, लो रात गई,
सूरज ढलकर पच्छिम पहुँचा
,
डूबा
, संध्या आई, छाई,
सौ संध्या-सी वह संध्या थी,
क्यों उठते-उठते सोचा था
,
दिन में होगी कुछ बात नई।
लो दिन बीता
, लो रात गई।

धीमे-धीमे तारे निकले
धीरे-धीरे नभ में फैले
,
सौ रजनी-सी वह रजनी थी
क्यों संध्या को यह सोचा था
,
निशि में होगी कुछ बात नई।
लो दिन बीता
, लो रात गई।

चिड़ियाँ चहकीं, कलियाँ महकी,
पूरब से फिर सूरज निकला
,
जैसे होती थी सुबह हुई,
क्यों सोते-सोते सोचा था
,
होगी प्रातः कुछ बात नई।
लो दिन बीता
, लो रात गई


‘हरिवंश राय बच्चन’

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